तो क्या छिन जाएगा अमेरिका से सुपर पावर का दर्जा..?

आज हम लोग चर्चा करेंगे कि कैसे अमेरिका अपने वर्चस्व को खोता जा रहा है और कौन-कौन उसके सामने आकर खड़ा हो गया है और कितने लोग कह रहे हैं आंखों में आंखें डाल कर उसके सामने हम आप को बड़ा नहीं मानते।

कहते हैं जब फर्स्ट वर्ल्ड वॉर हुआ और सेकंड वर्ल्ड वॉर हुआ तो जब उस दौरान यूरोपियन कंट्री आपस में लड़ झगड़ रहे थे उस समय अमेरिका अवसर तलाश करके उन्हें दवा जरूरी सामान और उन्हें पैसा पकड़ा रहा था इतना बड़ा दिलदार बन गया कि जो युद्ध जीतने वाले देश थे वह अपने जीतने के बाद भी कर्जे से अमेरिका का कर्ज चुका रहे थे और बड़ा अमेरिका बन गया करण निकला जब सेकंड वर्ल्ड वॉर खत्म हुआ तो उस समय दुनिया भर का तमाम पैसा क्योंकि दुनिया भर के देशों से उसने अपनी तरफ खींच रखा था अमेरिका सबसे सुप्रीम नेशन बन के उभर आया ।

अमेरिका बड़ा देश कैसे बना था
सन 1990 में जब सोवियत संघ का पतन हुआ तो अमेरिका को महाराजा बनने का मौका मिल गया पिछले करीब कई दशकों से अमेरिका पश्चिमी देशों का लीडर बना हुआ है लेकिन अब लगता है कि सिंहासन डोलने लगा है।

अमेरिका के अधिपत्य में दुनिया के कई देशों ने भी समृद्ध शीलता का आनंद उठाया वहीं कुछ लोग अब यह सवाल पूछने से भी नहीं हिचक रहे हैं कि क्या वाकई साल 1991 से विश्व में हो रही आर्थिक तरक्की के लिए सिर्फ अमेरिका को ही श्रेय मिलना चाहिए।

तो आइए हम जानते हैं किस प्रकार अमेरिकी वर्चस्व को चुनौती मिलना शुरू हुआ-
शुरुआत है हाल ही के घटनाक्रम से 24 तारीख जिसने कि अमेरिका को खुले में वर्चस्व की चुनौती दी वह तारीख जिस दिन रसिया ने यूक्रेन के ऊपर चढ़ाई कर दी अगले ही दिन अमेरिका भाड़ आता है और कहता है यदि किसी ने भी पुतिन सहायता करने की कोशिश की तो उसे घातक परिणाम भुगतने होंगे। जहां 141 देश शुरुआती समय पर अमेरिका का साथ दे रहे थे 1 महीने के अंदर लोगों को रसिया की बात समझ में आने लगी यूएन की वोटिंग के अंदर अमेरिका के पक्ष में 93 देश रह गए 193 देशों में।

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